Thursday, 29 January 2015

ग़ुस्सा आना चाहिये

भारत के इस हालात को देख कर कुछ नौजवानों को ग़ुस्सा आता है।  
सोचते होगे की मौक़ा मिला तो पुरे सिस्टम को आग लगा देंगे।
पर आख़िरकार निराश हो कर ,चुप चाप ग़म को दबाये ,आँखो में ग़ुस्सा लिये  बैठ जाते है।
ग़ुस्सा आना चाहिये पर क्यु भारत को मिटाने के लिये?  
नहीं पर भारत को बनाने के लिये ।
अगर कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ेगा ,इस देश का कुछ नहीं हो सकता  ये सोचने से पहले ये सोचे की भारत 
"माता की जय" सिर्क २६ जनवरी को या १५ अगस्त को बोल ने से नहीं होती ।
भारत बना ने के लिये उस की मुश्किलों  को जानना पड़ता है,समज ना पड़ता है ,कुछ बलिदान देना पड़ता है,
सिर्फ ड्राइंगरूम में चार न्युज चैनल देख ने से समस्या का पता नहीं चलता ।
समाज को बदल ने के लिये कुछ सोचो और करो ,ग़लत को ग़लत कहने से मत डरो ,
सच्च के  साथ खड़े रहने की हिम्मत रखो।
ये सब सुन के ज़्यादा दिमाग़ पे ज़ोर मत डाल ना , कही भारत का भविष्य उज्जवल ना हो जाये।
ये सारे राजनीतिक दल की दुकान बंध हो ना जाये ।
चलो मिलते हे फिर किसी समाज के समुद्रमंथन की लाचारी और बेचारी समस्या की चर्चा करने को ।
   (देश को ग़ुस्सा आता हे ना,,?)।                        
                                                                         आपका प्यारा ,
                                                                       हेमल कुमार ,

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